Baba
Kinshuk becomes football - 2
Namaskar,
Kindly see the below update on this situation....
http://anandamarganewsbulletin.blogspot.com
in Him,
Karmeshvara Deva
~ The below is courtesy of Tapas Chandra Kumbhakar via WhatsApp forums ~
पिछले
दो वर्षों से किंशुक जी किसी भी डीएमएस में नहीं जा सके हैं। वे किसी
रिपोर्टिंग में नहीं जाते, किसी केंद्रीय समिति की बैठक में भाग नहीं लेते,
और पिछले पंद्रह वर्षों में उन्होंने पुरोधा बोर्ड की एक भी बैठक नहीं की
है। इतनी निष्क्रियता के बाद भी क्या उन्हें इस सर्वोच्च पद पर बने रहना
चाहिए?
इसके लिए किसी
आध्यात्मिक रूप से उच्च व्यक्ति होने की भी आवश्यकता नहीं है; जिस व्यष्टि
में सामान्य-सा विवेक भी होगा, वह इस प्रकार पद और अधिकार से चिपका नहीं
रहेगा।
जापान के तत्कालीन
प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने स्वास्थ्य कारणों से प्रधानमंत्री के रूप में
पूरा समय नहीं दे पाने के कारण वर्ष 2020 में देश के हित को ध्यान में रखते
हुए स्वेच्छा से अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन हमारे एक
आध्यात्मिक संघटन के सर्वोच्च पदाधिकारी में इतनी निष्क्रियता के बावजूद भी
कोई आत्मबोध या संवेदना दिखाई नहीं देती। यह अत्यंत दुःखद है।
इतना
ही नहीं, किंगशुक जी के विरुद्ध एक-दो नहीं, बल्कि अनेक आर्थिक
अनियमितताओं और वित्तीय अपारदर्शिता के आरोप लिखित रूप में प्रस्तुत किए जा
चुके हैं। इसके बावजूद भी वे पूरी तरह निर्विकार हैं। उन्होंने किसी भी
आरोप का उत्तर देने या उसके निपटाने का प्रयास नहीं किया। यह सब पुरोधा
प्रमुख के पद की गरिमा बनाए रखने की दृष्टि से बिल्कुल भी गौरवपूर्ण नहीं
है, बल्कि अत्यंत लज्जाजनक है।
इतना
सब होने के बाद भी उनके भीतर न्यूनतम आत्मग्लानि या विवेक का उदय नहीं
हुआ। वे बिना कोई कार्य किए, इतने सारे आरोपों के बावजूद संघटन के इस
सर्वोच्च पद पर बने हुए हैं और संघटन से मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाते
जा रहे हैं।
आपसे मेरा विनम्र प्रश्न है—क्या किसी आध्यात्मिक विचारधारा से प्रेरित, विवेकशील व्यष्टि को ऐसा आचरण करना चाहिए?🙏
~ The above is courtesy of Tapas Chandra Kumbhakar via WhatsApp forums ~
== Section 2: Links ==
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